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सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

जमीन से चीजे जुड़ती है तो उमर-ए -दराज हो जाती है

जमीन से चीजे  जुड़ती है
तो उमर-ए -दराज हो जाती है
जोड़ो ना खुद को लोगो से
ख़ुशी के लिए लोग 
घर -जमीं छोड़ देते है

वक्त के साथ हैसियत बढ़ती है
तो चीजें ख्वाहिशों से मुनासिब हो जाती है
दायरा ना बढ़ाओ खुशियों का
हैसियत के साथ लोग 
दिलो में जगह खाली छोड़ देते हैं 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

समय की विवशता

इस राह से गुजरती है
बहुत सी बसे , कारे और दुसरे वहान
कितना मुशकिल है छोटी सी दूरी तय कर पाना उसके लिए
घंटो बीत जाते हैं इंतजार में
और यूँ ही जीवन

कौन रुकेगा उसके लिए और क्यों
सभी को अपना सफर तय करना है
और दुरीयां तय समय से कम मे हो
सभी चाहते हैं
फिर भी फांसलो और समय की विवशता क्यो जीवन में ?

मैं स्थिर हूँ वो गतिमान ये सापेक्षता
जीवन का आधार नहीं हो सकता
दूरियो को समय से नापना
एक संतुलन हो नही सकता
और समय चलता नहीं ,
बदलता है मानना होगा
मंजीलो के फांसले तय होगे ,
धीरज उसको धरना ही होगा

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

प्रथम नवरात्रि पूजन और मेरा बेसन का हलुआ

प्रथम नवरात्रि पूजन

सर्व प्रथम नवरात्रे पर्व पूजन की आपको बहुत- बहुत शुभकामनायेँ !


गृह स्वामिनी के व्रत अनुरोध को नकारते हुए विद्रोह का स्वर अति उन्मुख करते हुए हमने कह दिया की आज व्रत रख पाना संभव नहीं है। आँखों में दया, प्रेम और संकुचाहट के भाव लेकर बोली, आज के दिन तो सभी व्रत रखते है ! कम से कम आज के दिन तो रख लो ! पहला व्रत तो सभी रखते हैं | हमने बहाना दिया, मौसम परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य थोड़ा अस्थिर है अगर आप बेसन के हलुए को बना दोगे तो उसको खाकर के आराम कर लेंगे बस। खाना मत बनाना हमारे लिए, बड़े अहसान पूर्वक हमने शब्दों का बाण छोड़ दिया | अर्धांगिनी, मुख पर आश्चर्य भाव को लेकर रसोई में (मेरी पसंद बेसन का हलुआ) बनाने चली गयी।


नवरात्री व्रत और सुबह का मनभावन समय 

अक्टूबर की मनमोहक सुबह, अति मनोहर वातावरण के साथ में चिड़ियाँओ का अनुपम गुंजन ह्रदय में सवंदेशीलता के साथ आवाज उठाने लगा, वाह रे मनुष्य ! क्या मेरे लिए आज व्रत ( अन्न त्याग ) नहीं कर सकता? रोज मेरे सामने हाथ जोड़ता है तो फिर कैसी प्रार्थना है वो तुम्हारी? ये कैसा सम्बन्ध है हमारा और तुम्हारा? अरे! हम तो स्वयं के साथ साक्षात्कार करने लगे,  अन-सुलझे सवाल हमारे मस्तिष्क में लहरों से उठने लगे तो मन की धीमी सी आवाज आयी कि अच्छा है व्रत ही कर ले| किन्तु तब तक नयनतारा तो बेसन का हलुआ बनाने में लग चुकी थी, अब तो वह बादाम और नारियल का चुरा ऊपर- ऊपर बिखेर रही थी। शर्म से रोक पाना भी तर्क संगत नहीं लगा और बेसन का हलुआ सामने देखकर तो बिलकुल भी नहीं । 


पर भावावेश सोच लिया कि व्रत तो आज करना है, पर क्या व्रत केवल अन्न त्याग कर ही सम्भव हो सकता है? स्वयं से प्रश्न पूछा !!! अंत में निर्णय किया कि मानसिक व्रत करूँगा, विचारो पर नियंत्रण रखूँगा, रोज प्रतिदिन के विचारो को उनके श्रोत और माध्यम पर नियंत्रण करूँगा। हम जानते हैं माता दुर्गा शक्ति का प्रतीक है|  अत: विचार शक्ति को संयमित करके स्वयं, समाज और देश निर्माण के लिए व्रत करूँगा। किसी भी विचार को, जो  मेरे और समाज के हित में नहीं है उसको मस्तिष्क में स्थान नहीं दूंगा । आज कोई भी विचार जो इन भावनाओ से जुड़ा होगा जैसे कि ; दुःख, चिन्ता, भय:, कष्ट, क्रोध, आशंका और निराशा उसके लिए में अपने आपको नियंत्रण में रखूँगा। 

नवरात्री व्रत में पी एम नरेंद्र मोदी का खाना 

भावो को शब्द रूपी माला में पहनाकर व्यवस्थित करने लगा ही था की आवाज आई, अब..... ये हलुआ ठंडा नहीं हो रहा है? पत्नी की आदेशात्मक शैली का आभास होते ही कलम एक और रखकर, ठंडे होते हुए बेसन का हलुआ और चाय देखी तो एक नए व्रत का अहसास हो रहा था और अब विचारो की गति भी सामान्य अवस्था में चलने लगी थी। सभी तृष्णाएं शांत होकर बैठ गयी थी। बेसन का हलुआ आज पहले से अलग लग रहा था, क्योंकि आज स्वाद जीभ से नहीं मस्तिष्क की वैचारिक पृष्ठभूमि और मानसिक धरातल से था।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

वो एक शहर था, टूटना, बसना उसकी फितरत थी






हम तो इश्क़ में पहले से ही पागल थे
तू और दीवाना ना बना
ये तेरी इनायत है या मोहब्बत मेरी
मुझे अपनों से यूँ तो बेगाना, ना बना

शाम हु शील, होते- होते, यूँ ही गुजर जाऊंगा
तु महफ़िलो में ग़ुलाबी अँधेरा ना रख
तेरे चाहने वालो की भीड़ बहुत है, काबिल
मुझे टूटी हुई तस्वीरो में यूँ दीवारों पर ना रख


वो एक शहर था,
टूटना, बसना उसकी फितरत थी
तू मुसाफ़िर है, हर राहेदर पे पैर संभल के रख
और यहाँ अहसास है, मंजिल का सभी को
तू रास्तो से ज़रा शील, फांसला बना के रख


कोई लोगो से दिल मिलाने का हूनर भी तो देदे

कोई हमे जीने का बहाना तो दे
कोई हमारा हमसे चैन तो छीन ले
कोई तो ख़्वाबो में भी आये हमारे
कोई नींद हमारी भी तो हमसे छीन ले
मैं तो बहका बहका सा रहता हूँ
भीड़ में शहर की तेरे
कोई लोगो से दिल मिलाने का हूनर भी तो देदे


बुधवार, 12 अगस्त 2015

संसार के सबसे बड़े जनतंत्र की संसद


पिछले सालो से देश में संसद के अंदर, संसद के प्रतिनिधियों का व्यवहार, उनकी कार्य प्रणाली, स्पीकर महोदय के प्रति उनका रवैया और किसी भी मुददे पर उनका आपसी टकराव, सोचने पर विवश करने लगा है है कि वास्तव में संसार के सबसे बड़े जनतंत्र को निर्देशित करने वाले ये लोग देश के सर्वहित और सबके सुख की नीतियाँ निर्धारित करते हैं या फिर व्यक्तिगत और पार्टीगत मनमुटाव का फैंसला।

आन्तरिक और बाह्य खतरों के साथ-साथ देश के अंदर युवा वर्ग को एक उचित दिशा प्रदान करना उनके सामर्थ्य के लिए नीतियाँ निर्धारित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। संसद के विभिन्न सत्रों में सरकार द्वारा नए और संशोदित बिल पास कराना देश को विकास की ओर ले जाने का प्रयास होता है। जिस देश की छवि एक युवा देश की उभरती हो उस देश के युवाओ के अंदर आत्म सम्मान और आदर्शो को रखना बहुत ही जरूरी है। व्यक्तिगत आधार पर मुझको वर्तमान में इस बात पर कमी दिखाई पड़ती है। देश के नेताओ को पार्टी और व्यकितगत कारणों से ऊपर उठकर देश के विकास और सर्वहित के आदर्श सामने रखने होंगे अन्यथा बुद्धिजीवी युवाओ के साथ न्याय की बात करना असंगत ही होगा। 

क्या ये सम्भव नहीं हो सकता की संसद का कोई भी सत्र चलने से पहले माननीय प्रधानमंत्री जी संसद के प्रत्येक सदस्य (में.पा.) को ६ से १० घंटे का समय निर्धारित करे जिसमे वो देश की जनता द्वारा पूछे गए सवालो का लाइव टी वी पर जवाब दे। जिसका प्रसारण नेशनल टेलीविज़न पर समानांतर होता रहे। और वैसा ही संसद सत्र ख़त्म होने के बाद संसद सदस्य जनता के द्वारा पूछे गए और अपने प्रयासों को बताये। क्या ये संभव नहीं हो सकता की संसद सदस्य और जनता के बीच सत्र से पहले और बाद में संवाद हो । इस प्रणाली के लिए एक व्यवस्था की जा सकती है।  

मुझको निजी तौर पर अफसोस होता है जब किसी संसदीय क्षेत्र का नेता संसद और संसद के बहार वर्तमान सरकार से "देश की जनता" का सन्दर्भ देकर सवाल करता है.… देश की जनता पूछना चाहती है…।कृपया संसद और संसद के बहार नेता अपने संसदीय क्षेत्र का सन्दर्भ देकर सवाल करे तो क्षेत्र की समस्याओ का निराकरण होगा। केवल पार्टी अध्यक्ष और सरकार के मंत्री ("देश की जनता") ही इनका प्रयोग करे।

ये व्यवहार कितना उचित है कि अपने अधिकारों और मांगो के लिए संसद के सदस्य, अध्यक्ष के सामने आ जाए और लाइव उनको कार्ड दिखाए और वहां पर धरना दे। मेरा माननीया वर्तमान संसद अध्यक्षा जी से निवेदन है की कृप्या या तो संसद की कार्यवाही ना दिखाये या फिर आप सब नेता लोग सहमति बनाकर अपने कार्य को पूर्ण करे। में इन दिनों व्यक्तिगत रूप से संसद की कार्यवाही को देख कर आहत हूँ । 


डा० सुशील कुमार      





डिस्क्लेमर: ये मेरे विचार किसी पार्टी विशेष से प्रभावित और रोष रूप में ना होकर देश के प्रति मेरी भावनाओ का स्वरूप है। भारत देश की संसद और उसके सदस्यों के प्रति मेरा पूर्ण सम्मान है।  

    

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

My Pen and the Train's Fan



It was nice experience when I was travelling by train from city beautiful Chandigarh to the capital of India, New Delhi. The train was Kerla S kranti, it was a sleeper coach. On my rear side a family was sitting and infront a newly married couple. It was end of the month June and hot was on peak, Lady towards the window side was not feeling comfortable and were trying to do some experiment with the fan switches but it looks that she was not getting any result with her efforts. So, she called her husbands and ask that fan above on her sit is not working, please try to do something. The husband also tried his all efforts but couldn't succeed.

To run the fan he saw here and there and hit the fan also but again no success. He look towards me with full of enthusiasm, I think being a teacher and the maturity he feel that I can help him definitely. As I saw to him he requested and ask to me, sir do you have a pen ....?again being a teacher I always keep with me a good quality pen. I feel great, I thought man seems to be educated with nice personality, he will definitely drop the complain of it in complain box of Railway Department. I gave to him my costly soft pen , I shocked and surprised to see that immediately that merciless man inserted the pen in the net of fan to rotate it very carelessly.  

The man used it till that the fan didn't start to run. By the way somehow his experiment became successful and fan has started to rotate. Now, the lady was feeling proud on her husband. On all above, the man keep my pen with him more than 4-5 minutes and in the last when I was expecting some greetings he handover the pen without any thanks word.

No doubt, "if a pen is mightier than a sword how it can be less mightier than the hammer". 

Please respect the pen use it for writing only not to run the fan where dust is deposited on the excel of fan and instead of lubricant pen is used.   

बुधवार, 15 जुलाई 2015

THE MAGNIFICENT SUN TEMPLE AT KONARK ODISHA





It was 30th June 2015, when I visited the KONARK Sun temple again with curiosity to know more about the craving for stone. The magnificent Sun Temple at Konark is the culmination of Odisha temple architecture, and one of the most stunning monuments of religious architecture in the world. Built by the King Narasimhadeva in the thirteenth century, the entire temple was designed in the shape of a  colossal chariot with seven horses and twenty-four wheels, carrying the sun god, Surya,  across the heavens. Surya has been  a popular deity in   India since the Vedic period.




Videos:




मंगलवार, 5 मई 2015

Biot-Savart's Law Vs Spirituality near Stream Flow of Water an Analogy

In this video I have just try to explain that why almost all the spiritual activities are preferred in the cities of India which are situated on the bank of river specially right of the rivers (some are exceptional due to some other reason like migration of the path, etc.)?
This explanation is based on an analogy based on Biot-Savart's Law (What could be the painful to more than this that thousands year before developed science is seen through the window of just 200-250 yrs before develop physical sciences......and still many question marks......)  


All the ancient architecture of India is based on scientific facts, specially temples a spiritual places across the river. The yoga and meditation are the ornament of a person's life and our Monk, Rishis and Maharishis always give preference to do yoga and meditation early in the morning across the river. The reason of it is because the water flows this time in stream line without any disturbance (Comparatively to day time), in addition to the large amount of oxygen in suurounding. 

Our ancestor were very scientific, they were aware about the natural and supernatural forces (different type of fields). The astronomy was very advance and they were also aware about the radiation of different planet and that effects on body also, because of that they suggested some stone to wear for the person according to astrology birth chart, means a complete knowledge about the natural materials and the radiation of a particular planet (how they studied it ...is again a subject of matter).    

So here by using an analogy, I have just tried to understand that what happens when we do yoga and meditation near to the river in early morning, when water flows in stream line. This analogy is based on the Biot-Savart's Law which explain the direction and magnitude of the magnetic field which produces because of the stream flow of current in a conductor i.e. steady state current. The magnitude depends on some parameters like length of the wire, amount of the current, the angle between flow of current and the point where you want to determine the magnetic field and the distance. In the right hand side of the conductor (if current flowing in upward direction along the length of wire) the magnetic field is inward direction means enter into the plane. While on the otherhand this is outward means comes out from the plane. The nature of this force can be studied on the basis of some basic laws and by putting a magnetic source there. One can say that on the plane where these magnetic field lines enter seems that are coming from the North pole.

For the spiritual activities of a person near to the river in early morning I have used the above idea. I found an analogy between stream flow of water and its effect on human body and Biot-Savart's Law which was developed in 1820 for the study of magnetic field across the current carrying conductor.


It is very interesting the Jean Baptiste Biot who developed the above law for magnetism was an astronomer and he was aware about the Indian astronomy through the "Surya Siddhanta" in which astronomy was discussed completely by the Indian. The above law was developed in his last days. (Ref: Indian Journal of History of Science 35.4 (2000)319-346) 

In this discussion I have put conductor as a river, current equivalent to the flow of water and point at which we determines the magnetic field is the position of a person. So after making this analogy, my purpose was to explain positive change (spiritual changes) in the physical body because body have 2/3 portion of water, where water molecules are in polar form. So, I thinks that the stream water flow field try to align the water molecule in a particular direction like in the magnetic materials the external magnetic field interact with the atomic dipole of the magnetic materials. Hence an electric polarization (because of the polar form of water molecule) develops in the body which create further the potential differences, which further support to the high current in the body means high energy level of a person. A positive or spiritual changes in the life of a person.

Disclaimer: These are my personal points just on analogy based not to hurt any person or culture at any angle. Just an effort to understand the science with latest scientific facts. Please ignore if you find any discrepancy at any point or please give your remarks so I can improve that point from the angle of science.

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

Technology in Education

Advancement of technology and its use in education is good in today's classroom culture to help the students for visualization the subject related facts because education is limited in the boundary of academic institutions. 



Education means good CGPA, good communication and good corporate jobs. Academic institutes design the curriculum as per the demand of Industry. Industry absorbs the people who have same interest of fields, expertise or related field experience or information. Industry hire the people for the different jobs and ultimately with some more financial gain. Type of the industry and its services are two different aspects in which either one of them remain important for employees to join the same.

To get the better service in terms of time and productions, technology taking different shape in different service sectors, education is also one of them. A teaching by GURUKUL tradition, where teacher was responsible for the social and professional life of the student has been changed completely now days. Many factors are responsible for it. But still character of a student is certified by the teacher in this modern time also which shows that only teacher can understand students better than his/her parents. Also, indicate the social responsibility of a teacher for the development of a good society.




In GURUKULs an old tradition of education in India, after the basic education, to see the interest of students teacher assigned to them some skill based education, for example trained the student for carpentry work, goldsmith work, barber, farming work, weaving work or to trained for the protection of society or to trained for the academic, accounts work. Evaluation was based on practical performance so probably there was no discrimination among the people on the basis of their work and obviously importance to the work and the performance of a person. It is true also that how learning can be justify without the practical work.

What could be surprise more than this that up to the secondary education practical work is on readymade files only, there is no interest in science experiments and practical’s of the students, this is also true that project based marks and evaluation are in curriculum but there are many project selling shops also in our surroundings to help the students. Students buy and show in their respective labs for evaluation, sometimes they are good to explain the cramming concept and sometimes not. More than this could be funnier than this that a large number of such students follow the traditional path of performing the experiments in labs, if they are selected in good institute for higher study (Graduate course).  Now fighting starts to like and dislike the subject (s) or just start to loose the interest in academics.



New generation always catch the technology very fast and face its merits and de-merits. They spent maximum time with the technology and to learn about the related inventions either just for fun or for knowledge. The academic institutes try to incorporate so called relevant academic technology in their respective environment by making use of a personal computer, laptop, tablet, Wi-Fi, and projectors. While teaching remains on old traditional patterns except to the blackboard and white chalk. Now boards are either green or white but rest of the things is same. Teachers use the old traditional method to teach in class, they use board or projector for PPTs but this generation wants to play with technology. Why they see your lecture and focus on it, his mind is innovative that is fast, he wants to play with technology and you are giving him almost the same food as people were giving 100yrs before.




Today students are not supposed to sit in the classroom for one or two hours and listen some philosophical lectures which are not related to their interest. They are interested to play with technology, like simulation based exercise where they just feed the value, see the result and visualize the related facts. Not this experiment stops here, we provide to them advance technology through the childhood and asking them to learn things by 100yrs old pattern as I said earlier, now examination is not in a year, not in six months now we are evaluating their learning by assignments on every week and by examination on every month and finally at the end also from the total syllabus. I have some surprise here also, what we are checking? Their cramming power? or their learning ability ?or just try to show the system speed of evaluation?        


       
In this fast growing technology era still education industry have inefficient technical classroom environment and not properly technically equipped teachers and curriculum. Some so called academic leaders are just experimenting on the present generation by forcing the use of ICT that means only PPT-Projector, digital pad- online lectures and Wi-Fi. This is because of one reason new generation is not using technology in a proper and fruitful way. There is a big gap between use of technology in education and the classroom teaching of a so called traditional teacher. Who is not trained to transform their syllabus in digital form (simulation based exercises). 




 A uniform education system and easily available technology can help to fulfill the gap for quality learning; otherwise technically sound students will lose their interest, innovational thinking for the society. Probably they will get depressed with traditional teaching while those not technically sound will follow unknowingly with traditional teaching and will be good employee of an Industry in future.  Partial fusion of technology with education is not a good indication for society. Here at present inefficient technology and traditional teaching are suffering together.          


Disclaimer: These are my personal points about the present scenario of education system, if any point is not suitable for you that can be my fault because of my limited knowledge and understanding, please ignore.

रविवार, 19 अप्रैल 2015

प्लेटफॉर्म



यूँ तो अक्सर
सफर में छोटे बड़े
प्लेटफार्म निकलते जाते हैं
लेकिन रुक जाती हैं आँखे
ये नज़र
क्षण भर के लिए
टाट -पट्टियों से लिपटे
समाज पर
शरीर के उभारो को
छिपाती हुई
संस्कृति पर
सुखी हुई छाती से
नंगे आडम्बर को
दूध पिलाती हुई
अवयस्क परम्परा पर
बिखरे बालो को संवारती हुई
पतझड़ सी जवानी लिए हुए
२१ वी शताब्दी की सभ्यता पर
रुक जाती है आँखे
ये नज़र
क्षण भर के लिए
इस समाज , संस्कृति
परम्परा और सभ्यता पर